वो शहनाई नवाज़ों का गाँव था। तीस साल पहले जब मैं वहाँ से गुज़रा तो सड़क के दोनों तरफ़ लगे पोस्टरों और बैनरों को देखकर दंग रह गया था जिन पर लिखा था बुकिंग के लिए यहां संपर्क करें। 38 साल पहले मैंने पटना में शहनाई नवाज़ उस्ताद बिस्मिल्लाह खान को रात भर शहनाई बजाते हुए सुना था और सुबह जब वह प्रोग्राम ख़त्म हुआ तो उनके साथ एक तस्वीर भी खिंचवाई थी। एक मामूली सी पिपिहरी से क्या क्या हो सकता है यह उस्ताद ने अपने जीवन काल में कर दिखाया था। 35 साल पहले मैं उनसे बनारस में उनके घर मिलकर भी आया था। अब भितरगाँव से गुज़रते हुए अचरज से भरता रहा और तभी इन शहनाई नवाज़ों के गाँव का एक दौरा किया और पाया कि शहनाई के लुप्त होते स्वरों के बीच इन बजंतरियों का जीवन कैसे कैसे संकटों से भरा है। बारह साल पहले यह सपना पूरा हुआ कि इस गाँव में ठहर कर शहनाई की इस दुनिया पर एक डॉक्यूमेंटरी बना सकूं। यूट्यूब पर देखें The dwindling art of Shehnai playingकैसे कैसे हुनरमंद लोगों से भरे हैं हमारे देश के सुदूर अंचल और कैसी क्रूर अवहेलनाओं से न केवल उनका अस्तित्व संकट में है बल्कि वे कला रूप जो एक सभ्यता की कहानी संजोए हुए हैं, अपमानित और अंततः विलुप्त होने की ओर तेज़ी से बढ़ रहे हैं यह सब अपनी आँखों से देखना किसी अज़ाब से काम नहीं था। कलाकारों को उनकी दैनंदिन व्यस्तताओं के बीच एक स्थान पर जुटाना और उनसे वह संगीत सुनाने का आग्रह करना बहुत मुश्किल था क्योंकि यह अब उनके जीने में कोई मदद नहीं कर रहा था। कमेंट बॉक्स में ऐसी ही एक रिकॉर्डिंग सुनी जा सकती है जिनमें लगता है वादक किसी बदले की भावना से साज़ों को बरत रहे हों।
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