Hanumat Dashak हनुमान दशक
संकट हर सुख देत है, पवन तनय हनुमान।
राम भक्त बजरंगबली, बुद्धि बलज्ञान निधान ॥1 ॥
बालपन में सूर्य को, ग्रस लियो हनुमन्त ।
देवन की सुन विनय को, कष्ट हरे बलवन्त ।।2 ।।
बाली के भय से छिपे, गिरि में जा सुग्रीव।
मरवा बाली राम से, कीन सुखी निज पीव ॥3 ॥
लख चिन्ता में सैन को, कहा ऋशेश्वर टेर।
पार गये तब सिन्धु से, कष्ट हरा सब केर ॥4॥
सुरसा का मद चूर कर, पुनि लंकिन को मार।
दर्श विभीषण को दिखा, पहुंचे बाग मंझार ॥5॥
विरह व्याकुल समय जब, मांगे रुख से आग।
शोक हरा तब सीय का, दे मुन्दरी पद लाग ॥6॥
बाग उजाड़िया अखेय हन, दीनि लंका जार।
दीना धीरज राम को, आके पवन कुमार ॥7॥
लक्ष्मण मूर्छित जब भये, लाये वैद्य सुषेण।
ला दीनी सन्जीवनी, लक्ष्मण पाया चैन ॥8 ॥
नांग फास में फंस गए, राम सहित सब वीर।
हनुमत लाये गरुड़ को, काटी सब की पीर ॥9॥
राम लक्ष्मण को ले गये, अहिरावण पाताल।
मारे सैन सहित सिंह, दीना सूख विशाल ।॥ 10 ॥
पढ़त दशक हनुमन्त का, जो जन मन चित्त लाय। "
बसन्त" तांके काज सब, सिद्ध करत कपिराय ।॥
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